
शंकराचार्य के मुद्दे पर संत समाज के भीतर मतभेद खुलकर सामने आ गए हैं. अखिल भारतीय संत समिति के राष्ट्रीय महामंत्री स्वामी जितेंद्रानंद सरस्वती ने कड़ा बयान देते हुए कहा कि कोर्ट में ऐसे प्रमाण मौजूद हैं, जिनके आधार पर अविमुक्तेश्वरानंद को शंकराचार्य नहीं माना जा सकता. उन्होंने यह भी आरोप लगाया कि “ये हर बार पीटे जाते हैं” और स्नान के दौरान अव्यवस्था फैला रहे थे. उनके बयान के बाद विवाद और गहरा गया.
सामने रखा सुप्रीम कोर्ट से जुड़ा दस्तावेज
स्वामी जितेंद्रानंद सरस्वती ने ज्योतिषपीठ शंकराचार्य पद को लेकर चल रहे विवाद में स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद को लेकर सुप्रीम कोर्ट से जुड़ा अहम दस्तावेज सामने दिखाया है.
दस्तावेज के मुताबिक, जब तक मामले में अंतिम फैसला नहीं हो जाता, तब तक न तो स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद और न ही कोई अन्य व्यक्ति शंकराचार्य के रूप में नियुक्ति या पट्टाभिषेक कर सकता है.
आदेश में यह भी कहा गया है कि अविमुक्तेश्वरानंद को शंकराचार्य के तौर पर किसी तरह की सुविधा देना कोर्ट की अवमानना माना जाएगा. यह मामला सुप्रीम कोर्ट में सिविल अपील के रूप में लंबित है.
बता दें सोमवार (19 जनवरी) को मेला प्रशासन की ओर से शंकराचार्य अविमुक्तेश्वरानंद को एक नोटिस भेजा गया था. नोटिस में उनके नाम के आगे ‘शंकराचार्य’ लिखे जाने पर आपत्ति जताई गई थी. प्रशासन का कहना है कि वे खुद को शंकराचार्य नहीं कह सकते.
समाधान पर क्या बोले अविमुक्तेश्वरानंद
विवाद के समाधान को लेकर अविमुक्तेश्वरानंद ने कहा कि वे संगम में सम्मानजनक तरीके से स्नान करेंगे और उसके बाद ही शिविर में प्रवेश करेंगे. उन्होंने यह भी स्पष्ट किया कि जिन संन्यासियों, ब्रह्मचारियों और मातृशक्ति के साथ दुर्व्यवहार हुआ है, उनसे पहले क्षमा याचना होनी चाहिए. उनके मुताबिक, सम्मानजनक समाधान में हो रही देरी समझ से परे है.
इस पूरे मामले ने माघ मेले की शांति और व्यवस्था पर सवाल खड़े कर दिए हैं. एक तरफ संत समाज के भीतर मतभेद हैं, तो दूसरी तरफ प्रशासन कानूनी प्रक्रिया का हवाला दे रहा है. अब सभी की नजरें इस बात पर टिकी हैं कि बातचीत से कोई रास्ता निकलता है या यह विवाद और लंबा खिंचता है
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