'तेंदुए की गुफा से 1 KM का दायरा अव्यावहारिक, इसे घटाकर 80 मीटर करो': जवाई क्षेत्र के किसानों ने पाली कलेक्ट्रेट पर दिया धरना, उग्र आंदोलन की चेतावनी
‘तेंदुए की गुफा से 1 KM का दायरा अव्यावहारिक, इसे घटाकर 80 मीटर करो’: जवाई क्षेत्र के किसानों ने पाली कलेक्ट्रेट पर दिया धरना, उग्र आंदोलन की चेतावनी

पाली/सुमेरपुर। मारवाड़ की शान कहे जाने वाले जवाई लेपर्ड कंजर्वेशन रिजर्व क्षेत्र में अब पैंथर्स और इंसानों के बीच नहीं, बल्कि ‘सिस्टम बनाम जनता’ का बड़ा टकराव शुरू हो गया है। राजस्थान उच्च न्यायालय के निर्देश और वन विभाग द्वारा जारी की गई नई मानक संचालन प्रक्रिया (SOP) के तहत तेंदुए की गुफाओं (Leopard Caves) से 1 किलोमीटर के दायरे को पूरी तरह प्रतिबंधित क्षेत्र घोषित करने के फैसले ने पूरे जवाई बेल्ट में बारूद जैसा माहौल खड़ा कर दिया है। गुरुवार को ग्राम पंचायत सेणा, बीसलपुर, दूदनी, कोठार और आसपास के दर्जनों ढाणियों से सैकड़ों की तादाद में किसान, पशुपालक और युवा ट्रैक्टर-गाड़ियों से जिला मुख्यालय पाली पहुंचे। कलेक्ट्रेट के मुख्य द्वार पर जोरदार नारेबाजी के साथ सांकेतिक महाधरना दिया गया और जिला कलेक्टर को राज्यपाल व मुख्यमंत्री के नाम ज्ञापन सौंपकर आर-पार की लड़ाई का ऐलान कर दिया गया।

“1 किलोमीटर का प्रतिबंध यानी पूरा जवाई इलाका सील”

कलेक्ट्रेट पर धरने को संबोधित करते हुए किसान संघर्ष समिति के अध्यक्ष जयेन्द्रसिंह गलथनी ने वन विभाग के नीति-निर्माताओं पर जमीनी हकीकत से बेखबर होने का आरोप लगाया। उन्होंने कहा:

“तेंदुए की गुफा से 1000 मीटर (1 किमी) का दायरा तय करना पूरी तरह कागजी और अव्यावहारिक है। जवाई की भौगोलिक बनावट ऐसी है कि हर 500-700 मीटर पर कोई न कोई पहाड़ी या ग्रेनाइट की गुफा है। अगर 1 किलोमीटर का दायरा प्रतिबंधित किया गया, तो किसानों के पुश्तैनी खेत, ट्यूबवेल, कुएं, रहवासी ढाणियां और मवेशियों के बाड़े सब प्रतिबंधित जोन में आ जाएंगे। किसान न तो अपनी जमीन पर हल चला पाएगा और न ही पशुओं के लिए चारा उगा सकेगा। हमारी सीधी मांग है कि इस सीमा को घटाकर अधिकतम 80 मीटर किया जाए, जिससे वन्यजीव भी सुरक्षित रहें और किसानों की आजीविका पर भी बुलडोजर न चले।”

ग्रामीणों ने जोर देकर कहा कि उनकी निजी खातेदारी भूमि पर आधुनिक खेती, पॉलीहाउस, सोलर पंप लगाने, नए कुएं खोदने, डेयरी फार्मिंग, गोट फार्मिंग और केटल शेड (पशु बाड़े) बनाने की बिना शर्त छूट मिलनी चाहिए।

‘अंधा बांटे रेवड़ी’: लोकल किसानों पर पाबंदी, बाहरी पूंजीपतियों के आलीशान रिसॉर्ट शून्य मीटर पर!

प्रदर्शनकारियों ने वन विभाग और स्थानीय प्रशासन की कार्यशैली पर गंभीर सवाल खड़े किए। ग्रामीणों ने आरोप लगाया कि पर्यावरण और पैंथर्स के संरक्षण के नाम पर केवल गरीब किसानों और स्थानीय देवासी व राजपूत समाज के पशुपालकों को बलि का बकरा बनाया जा रहा है।

  • 0 मीटर पर बहुमंजिला निर्माण: ग्रामीणों ने दस्तावेजों के हवाले से खुलासा किया कि कोठार क्षेत्र में लिलोड़ा पहाड़ी के बिल्कुल मुहाने पर, तेंदुए की सक्रिय गुफा से शून्य मीटर (0 Meter) की दूरी पर रसूखदार बाहरी व्यवसायियों का बहुमंजिला लग्जरी होटल धड़ल्ले से बनकर तैयार हो रहा है।

  • विभाग की चुप्पी पर सवाल: जब गरीब किसान अपनी ही जमीन पर तारबंदी या मवेशियों के लिए शेड बनाता है तो वनकर्मी नोटिस थमा देते हैं, लेकिन पहाड़ियों को छलनी कर बनाए जा रहे कॉर्पोरेट रिसॉर्ट्स पर प्रशासन ने आंखें मूंद रखी हैं।

  • मांग: ग्रामीणों ने लिलोड़ा पहाड़ी और अन्य संवेदनशील इलाकों में चल रहे सभी अवैध व्यावसायिक प्रोजेक्ट्स को तुरंत सील कर बुलडोजर चलाने की मांग की। साथ ही बाहरी पूंजीपतियों के नए प्रोजेक्ट्स पर पूरी रोक लगाकर स्थानीय मूल निवासियों के लिए ‘होम-स्टे’ और ‘रूरल कम्युनिटी टूरिज्म’ को प्राथमिकता देने की पैरवी की।

दर्दनाक हकीकत: 80% जमीन पहले ही जवाई बांध के पेटे में समाई, अब 5 वर्ग किमी में कहां जाएं?

धरने में शामिल बुजुर्गों और जनप्रतिनिधियों ने जवाई के इतिहास का हवाला देते हुए अपनी व्यथा साझा की:

  1. विस्थापन का दंश: सेणा, बीसलपुर, दूदनी और जवाई क्षेत्र के गांवों की 80 फीसदी उपजाऊ जमीन 1950 के दशक में जवाई बांध के निर्माण के दौरान डूब क्षेत्र में चली गई थी।

  2. सीमित दायरा: ग्रामीणों के पास अब पहाड़ियों और बंजर टीलों के बीच मात्र 5 वर्ग किलोमीटर का दायरा बचा है, जिसमें कई पीढ़ियां किसी तरह गुजर-बसर कर रही हैं।

  3. अस्तित्व का संकट: यदि इस बचे-खुचे 5 वर्ग किमी क्षेत्र में 1-1 किमी के बफर जोन लागू कर दिए गए, तो हजारों परिवारों को अपनी ही मिट्टी से बेदखल होना पड़ेगा।

  4. अलोकतांत्रिक SOP: ग्रामीणों ने रोष जताया कि वन विभाग के अधिकारियों ने बिना किसी ग्राम सभा, पंचायत समिति या स्थानीय जनप्रतिनिधि से परामर्श किए, वातानुकूलित कमरों में बैठकर यह तुगलकी फरमान तैयार कर दिया है।

2013 का कम्युनिटी रिजर्व समझौता लागू हो, गोचर भूमि से हटे कब्जा

आंदोलनकारियों ने स्पष्ट किया कि जवाई का किसान कभी वन्यजीवों का विरोधी नहीं रहा। सदियों से रबारी-देवासी समाज और किसान पैंथर्स के साथ शांतिपूर्ण तरीके से रहते आए हैं, जिसके कारण आज पूरी दुनिया में ‘जवाई लेपर्ड सफारी’ प्रसिद्ध है।

ग्रामीणों ने प्रशासन के समक्ष दो मुख्य शर्तें रखीं:

  • 2013 के समझौते की बहाली: वर्ष 2013 में ग्रामीणों और सरकार के बीच हुए कम्युनिटी रिजर्व समझौते के नियमों को हूबहू लागू किया जाए, जिसमें ग्रामीणों के पारंपरिक अधिकारों की गारंटी दी गई थी।

  • गोचर-ओरण भूमि मुक्त हो: बाहरी होटल माफियाओं और रसूखदारों ने सरकारी चारागाह और गोचर भूमि पर जो अवैध तारबंदी और कब्जे किए हैं, उन्हें तुरंत हटाकर मवेशियों के चरने के लिए जमीन को मुक्त कराया जाए।

चेतावनी: ‘मांगें नहीं मानीं तो हाईवे जाम और आमरण अनशन होगा’

कलेक्ट्रेट परिसर में ज्ञापन सौंपने के बाद किसान नेताओं ने खुली चेतावनी दी कि यह केवल एक सांकेतिक चेतावनी थी। यदि सरकार और वन विभाग ने 7 दिनों के भीतर इस एसओपी में संशोधन कर 1 किमी के दायरे को घटाकर 80 मीटर नहीं किया, तो पूरा जवाई क्षेत्र सुमेरपुर, फालना और पाली के मुख्य मार्गों को जाम करेगा और कलेक्ट्रेट पर अनिश्चितकालीन आमरण अनशन शुरू किया जाएगा।

धरने में ये प्रमुख लोग रहे मौजूद: इस विशाल प्रदर्शन में किसान संघर्ष समिति अध्यक्ष जयेन्द्रसिंह गलथनी, रघुवीरसिंह बीसलपुर, मनमोहन सिंह बीसलपुर, संग्राम सिंह वेलार, विक्रमसिंह बीजापुर, विक्रमसिंह जीवंदा, लालाराम देवासी, राजेंद्रसिंह राणावत सेणा, विकासपाल सिंह सेणा, भूपेन्द्रसिंह सेणा, डूंगरसिंह सेणा, हनवत सिंह जीवंदा, अजयपालसिंह हेमावास, महावीरसिंह टेवाली, कानसिंह, भंवरलाल प्रजापत, गणपत देवासी सहित सैकड़ों किसान और युवा मौजूद रहे।

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