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विशेष संपादकीय: पूर्व विधायक संयम लोढ़ा हत्याकांड की साजिश—नेपाल कनेक्शन, लॉरेंस सिंडिकेट और सियासी गलियारों में उठते गंभीर सवाल

सिरोही/जोधपुर। राजस्थान की शांत वादियों और मारवाड़ की राजनीति में उस वक्त जबर्दस्त भूचाल आ गया, जब सिरोही के पूर्व निर्दलीय विधायक एवं पूर्व मुख्यमंत्री अशोक गहलोत के राजनीतिक सलाहकार रहे संयम लोढ़ा की हत्या की साजिश का भंडाफोड़ हुआ। मामला केवल एक स्थानीय नेता को धमकी देने तक सीमित नहीं रहा, बल्कि इसके तार सीधे तिहाड़ और साबरमती जेल में बंद लॉरेंस बिश्नोई सिंडिकेट, सीमा पार नेपाल से भेजे गए शूटरों, स्थानीय स्तर पर की गई गहन रेकी और सिरोही के एक शोरूम से नकद खरीदी गई बाइक तक जा पहुंचे।

यह पूरा मामला आखिरकार शुरू कहां से हुआ, इसके पीछे की असली वजह क्या रही, क्या इसके तार किसी पुरानी राजनीतिक अथवा व्यावसायिक रंजिश से जुड़े हैं या फिर सियासी गलियारों में कानाफूसी के मुताबिक यह सिर्फ सुरक्षा का घेरा बढ़ाने का कोई सुनियोजित हथकंडा है? पुलिस जांच, प्रशासनिक सूत्रों और राजनीतिक विश्लेषण के आईने में इस पूरे घटनाक्रम की परत-दर-परत पड़ताल।

1. कहां से शुरू हुआ मामला और अब तक क्या-क्या हुआ?

इस सनसनीखेज साजिश का खुलासा अचानक नहीं हुआ, बल्कि इसकी नींव तब पड़ी जब राजस्थान पुलिस की एंटी गैंगस्टर टास्क फोर्स (AGTF) और केंद्रीय खुफिया एजेंसियों को लॉरेंस बिश्नोई गैंग के विदेशी व अंतरराज्यीय गुर्गों के बीच हो रही बातचीत के इनपुट मिले। इस कड़ी में जोधपुर कमिश्नरेट के एयरपोर्ट पुलिस थाने में इस आपराधिक षड्यंत्र को लेकर औपचारिक मुकदमा दर्ज किया गया।

जांच में सामने आया कि लॉरेंस सिंडिकेट ने लोढ़ा को ठिकाने लगाने के लिए नेपाल के रास्ते दो पेशेवर शूटरों—जसकरण और राजेंद्र—को राजस्थान भेजा था। ये दोनों शूटर सिरोही पहुंचे और उन्होंने संयम लोढ़ा के फार्महाउस, उनकी दिनचर्या, उनके आने-जाने के रास्तों और उनके इर्द-गिर्द रहने वाले लोगों की कई दिनों तक लगातार रेकी की। हाल ही में इस मामले में तब सबसे बड़ा मोड़ आया जब सिरोही के हीरो शोरूम से एक एक्सक्लूसिव सीसीटीवी फुटेज सामने आया। फुटेज में शूटर 84 हजार रुपये नकद देकर नई स्प्लेंडर बाइक खरीदते और उसके तुरंत बाद पेट्रोल पंप पर टंकी फुल करवाते साफ दिखाई दिए। शोरूम में उन्होंने हरियाणा के पहचान दस्तावेज दिए थे।

2. क्यों हुआ यह टारगेट: रंगदारी, पुरानी दुश्मनी या गैंग का ‘मारवाड़ दबदबा’?

इस साजिश के पीछे के कारणों को लेकर जांच एजेंसियां मुख्य रूप से तीन बड़े पहलुओं पर काम कर रही हैं:

  • लॉरेंस गैंग का विस्तार और पॉलिटिकल टारगेटिंग: लॉरेंस बिश्नोई सिंडिकेट लंबे समय से राजस्थान, पंजाब और हरियाणा में बड़े राजनेताओं, कारोबारियों और हस्तियों को निशाना बनाकर अपनी दहशत और समानांतर सत्ता स्थापित करने की कोशिश करता रहा है। सुखदेव सिंह गोगामेड़ी हत्याकांड के बाद से ही यह स्पष्ट हो चुका है कि यह गिरोह हाई-प्रोफाइल लोगों को निशाना बनाकर राष्ट्रीय स्तर पर खौफ का माहौल तैयार करना चाहता है।

  • अवैध वसूली (एक्सटॉर्शन) और दबाव: मारवाड़ और सिरोही-जालोर बेल्ट में कई बड़े खनन, रियल एस्टेट और टोल कारोबारी सक्रिय हैं। संयम लोढ़ा इस इलाके के सबसे रसूखदार और मुखर नेताओं में गिने जाते हैं। जांच का एक कोण यह भी है कि क्या लोढ़ा पर दबाव बनाकर किसी बड़े आर्थिक नेटवर्क को साधने या गैंग की उगाही का जरिया बनाने की मंशा थी।

  • पुरानी स्थानीय रंजिश की कड़ियां: सिरोही की राजनीति में संयम लोढ़ा अपने आक्रामक बयानों और स्थानीय स्तर पर जमीनों, पट्टों व प्रशासनिक घोटालों के खिलाफ खुलकर बोलने के लिए जाने जाते हैं। पुलिस इस बात की भी गोपनीय पड़ताल कर रही है कि क्या स्थानीय स्तर पर उनके किसी बड़े विरोधी या सिंडिकेट से जुड़े लोगों ने लॉरेंस गैंग को ‘सुपारी’ देकर या स्थानीय संसाधन मुहैया कराकर यह पूरी बिसात बिछाई।

3. क्या सुरक्षा बढ़ाने के लिए रचा गया सियासी ड्रामा?

मारवाड़ के सियासी गलियारों और सोशल मीडिया पर एक वर्ग यह सवाल भी उठा रहा है कि क्या विधानसभा चुनाव हारने के बाद अपनी घटती सुरक्षा को वापस हासिल करने और राजनीतिक प्रासंगिकता बनाए रखने के लिए इस मामले को बढ़ा-चढ़ाकर पेश किया गया?

हालांकि, निष्पक्ष और तथ्यात्मक दृष्टि से देखने पर इस ‘स्क्रिप्टेड थ्योरी’ में कानूनी और तकनीकी तौर पर कई बड़े झोल नजर आते हैं:

  • एडीजी दिनेश एमएन और एजीटीएफ की सीधी जांच: इस मामले का खुलासा किसी स्थानीय थाने के सामान्य सिपाही ने नहीं, बल्कि राजस्थान के सबसे सख्त और विश्वसनीय आईपीएस अधिकारियों में शुमार एडीजी दिनेश एमएन के नेतृत्व वाली एंटी गैंगस्टर टास्क फोर्स ने किया है। एजीटीएफ जैसे पेशेवर विंग कभी किसी नेता के कहने पर मनगढ़ंत कहानी नहीं गढ़ते।

  • अंतरराष्ट्रीय शूटरों और स्वतंत्र सबूतों की मौजूदगी: नेपाल से शूटरों का आना, उनका सिरोही के शोरूम में व्यक्तिगत रूप से खड़े होकर 84 हजार नकद देकर बाइक खरीदना, पेट्रोल पंप पर दिखना और हरियाणा के आधार कार्ड का उपयोग—ये ऐसे जमीनी और फॉरेंसिक सबूत हैं जिन्हें कोई भी नेता खुद तैयार नहीं करवा सकता।

  • जान का वास्तविक खतरा: लॉरेंस गैंग का ट्रैक रिकॉर्ड बताता है कि जब उनके शूटर जमीन पर उतरकर रेकी शुरू कर देते हैं, तो खतरा 100 फीसदी वास्तविक होता है। इसे केवल ‘सुरक्षा लेने का हथकंडा’ मानकर खारिज करना पुलिस के लिए आत्मघाती हो सकता था।

4. प्रशासनिक नाकामी और स्थानीय स्लीपर सेल पर गहराते सवाल

इस पूरे घटनाक्रम ने सिरोही जिला पुलिस और स्थानीय खुफिया तंत्र (CID-CB) की कार्यशैली पर कड़े सवाल खड़े कर दिए हैं। नेपाल से चलकर आए दो भाड़े के हत्यारे सिरोही के बाजार में खुलेआम घूमते रहे, नकदी देकर वाहन खरीदते रहे और पूर्व विधायक के फार्महाउस की रेकी करते रहे, लेकिन स्थानीय पुलिस को इसकी भनक तक नहीं लगी। जब जोधपुर पुलिस और एजीटीएफ ने सुराग जुटाए, तब जाकर सिरोही पुलिस हरकत में आई।

अब सबसे बड़ा सवाल यह है कि सिरोही में इन शूटरों को पनाह किसने दी? वह कौन स्थानीय मददगार था जिसने इन्हें फार्महाउस का रास्ता दिखाया, इन्हें छिपने की जगह दी और कैश की व्यवस्था कराई? पुलिस अब कॉल डिटेल रिकॉर्ड (CDR), टावर डंप और शोरूम के आसपास मौजूद लोगों के संपर्कों को खंगालकर उस स्थानीय ‘गद्दार’ तक पहुंचने की कोशिश कर रही है।

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