पाली: राष्ट्रीय बाल सरक्षण आयोग व जिला प्रसाशन के संयुक्त तत्वावधान मे बाल अधिकार संरक्षण के मुद्दों पर जिला स्तरीय कॉन्फ्रेंस

पाली, 7 नवम्बर। राष्ट्रीय बाल अधिकार सरक्षण आयोग, नई दिल्ली व जिला प्रसाशन से सयुंक्त रूप से बाल अधिकार कानूनों के कार्यान्वयन पर जिला स्तरीय कॉन्फ्रेंस आज शुक्रवार को जिला परिषद सभागार में आयोजित की गई जिसमे सम्बंधित विभागो के 150 प्रतिभागियों ने भाग लिया.

शिक्षकों, बच्चों और अभिभावकों को सशक्त बनाकर एक सुरक्षित उक्त कॉन्फ्रेंस मे वातावरण का निर्माण करना, स्कूलों में बदमाशी और साइबर बदमाशी की पहचान व रोकथाम, पोक्सो अधिनियम 2012 के मद्दे, कमियों और चुनोतियों सहित अन्य विषयों में चर्चा की गई।
जिला कलक्टर एलएन मंत्री ने बताया कि बाल सरंक्षण व बाल्यावस्था में मानसिक पौषण को बढ़ावा देना ताकि राष्ट्र निर्माण में भागीदार बने। जिला विधिक सेवा प्राधिकरण सचिव विक्रम सिंह भाटी ने बताया कि बाल अधिकारों के लिए प्रशासन हमेशा तत्पर रहा है, बाल अधिकार हनन होने पर बच्चों को उसे पूर्ण अधिकार प्रदान है कि कानूनी जानकारी व गुड टच या बेड टच की समझ बताते है। दिव्यांगों के लिए खेलकूद प्रतियोगिताएं एवं जिला विधिक सेवा प्राधिकरण द्वारा समय समय पर अनेक कार्यक्रमों का आयोजन किया जाता है।

श्री विक्रम सिंह भाटी ADJ सचिव जिला विधिक सेवा प्राधिकरण पाली ने बाल सरक्षण व जिला विधिक सेवा प्राधिकरण के कार्यों पर प्रकाश डाला व पीड़ित प्रतकर योजना के सम्बन्ध मे विचार व्यक्त किये
पुलिस अधीक्षक आदर्श सिंधु ने बताया कि बच्चों को उनके अधिकारों से अवगत करवाकर उज्जवल भविष्य बनाना आईटी सोशल मीडिया, सोईबर बुलिंग, एआई लिंक वीडियों के दुष्प्रभाव से बचाना, स्पेशन महिला बाल डेस्क की स्थापना, पोस्कों एक्ट दर्ज मामलों पर त्वरित व सही जांच कर बच्चों को सुरक्षित रखना है।

बाल अधिकार विशेषज्ञ व पूर्व सदस्य राजस्थान राज्य बाल सरक्षण आयोग डॉ शैलेन्द्र पंड्या ने बताया कि बाल अधिकारों का संरक्षण और संवर्धन एक संवैधानिक अधिदेश है और भारत के सामाजिक विकास एजेंडे की एक प्रमुख प्राथमिकता है। बाल अधिकार संरक्षण आयोग अधिनियम, 2005 के तहत स्थापित राष्ट्रीय बाल अधिकार संरक्षण आयोग (एनसीपीसीआर) का दायित्व है कि वह यह सुनिश्चित करे कि सभी कानून, नीतियाँ और कार्यक्रम संयुक्त राष्ट्र बाल अधिकार सम्मेलन(यूएनसीआरसी) के सिद्धांतों के अनुरूप हों। हाल के वर्षों में, स्कूलों और सामुदायिक परिवेश में बच्चों की सुरक्षा और संरक्षण को लेकर चिंताएँ बढ़ रही हैं। बदमाशी, साइबर बदमाशी, शारीरिक दंड, यौन शोषण और उपेक्षा जैसे मुद्दे बच्चों के शारीरिक और भावनात्मक स्वास्थ्य के लिए लगातार ख़तरा बने हुए हैं। इसी प्रकार, किशोर न्याय (बच्चों की देखभाल और संरक्षण) अधिनियम, 2015 और यौन अपराधों से बच्चों का संरक्षण (पॉक्सो) अधिनियम, 2012 का प्रभावी कार्यान्वयन संस्थागत सुदृढ़ीकरण और अंतर-विभागीय समन्वय के लिए एक महत्वपूर्ण क्षेत्र बना हुआ है। बाल संरक्षण तंत्र को मजबूत करने और बच्चों के लिए सुरक्षित शिक्षण वातावरण सुनिश्चित करने के लिए प्रमुख जिला स्तरीय हितधारकों को संवेदनशील बनाया जा सके और उन्हें शामिल किया जा सके।

उन्होंने बताया कि निःशुल्क एवं अनिवार्य बाल शिक्षा अधिकार (आरटीई) अधिनियम, 2009 के अंतर्गत जवाबदेही ढांचे की समझ को मजबूत करना, विशेष रूप से स्कूलों में बच्चों की सुरक्षा और संरक्षण सुनिश्चित करना। स्कूलों में बदमाशी और साइबर बदमाशी के बारे में हितधारकों को संवेदनशील बनाना, जिसमें पहचान, रोकथाम और निवारण तंत्र शामिल हैं। शिक्षकों, अभिभावकों और स्कूल प्राधिकारियों के सशक्तिकरण के माध्यम से बच्चों के लिए सुरक्षित और सक्षम वातावरण बनाने के उपायों पर चर्चा करें।

एनसीपीसीआर दिल्ली से कन्सलटेन्ट प्रोफ़ेसनल लॉ एडवोकेट अंशिता सुराना ने बताया कि किशोर न्याय (बच्चों की देखभाल और संरक्षण) अधिनियम, 2015 और यौन अपराधों से बच्चों का संरक्षण अधिनियम, 2012 के क्रियान्वयन की स्थिति और चुनौतियों की समीक्षा करें। बच्चों की समग्र सुरक्षा सुनिश्चित करने के लिए शिक्षा, पुलिस, सामाजिक कल्याण, स्वास्थ्य और न्यायिक प्रणालियों के बीच अभिसरण और समन्वय को बढ़ावा देना। आरटीई अधिनियम, 2009 के अनुसार जवाबदेही ढांचा, स्कूलों में बच्चों की सुरक्षा पर एनसीपीसीआर के मैनुअल का अनुपालन सुनिश्चित करना, स्कूल प्रबंधन समितियों (एसएमसी), प्रधानाध्यापकों और स्थानीय प्राधिकारियों की संस्थागत जिम्मेदारी। स्कूल सुरक्षा उल्लंघनों के लिए निगरानी और शिकायत निवारण तंत्र, स्कूलों में बदमाशी और साइबर बदमाशी, बदमाशी और डिजिटल दुर्व्यवहार के संकेतकों की पहचान करना, स्कूल-आधारित रोकथाम नीतियों और रिपोर्टिंग प्रोटोकॉल का विकास करना, बच्चों में लचीलापन पैदा करना और शिक्षकों और अभिभावकों को जिम्मेदार डिजिटल व्यवहार के प्रति संवेदनशील बनाना, सुरक्षित वातावरण का निर्माणरू शिक्षकों, बच्चों और अभिभावकों को सशक्त बनाना, प्रारंभिक पहचान और हस्तक्षेप में शिक्षकों और परामर्शदाताओं की भूमिका, भावनात्मक सुरक्षा और बच्चों की ऑनलाइन सुरक्षा पर अभिभावकों की जागरूकता, स्कूली पाठ्यक्रम में सुरक्षा शिक्षा और जीवन कौशल को एकीकृत करना, जेजे अधिनियम, 2015 और पोक्सो अधिनियम, 2012 के कार्यान्वयन में मुद्दे और अंतराल, बाल कल्याण समितियों (सीडब्ल्यूसी), किशोर न्याय बोर्ड (जेजेबी), विशेष किशोर पुलिस इकाइयों (एसजेपीयू) और जिला बाल संरक्षण इकाइयों (डीसीपीयू) के बीच समन्वय को मजबूत करना, बच्चों के अनुकूल जांच और परीक्षण प्रक्रिया सुनिश्चित करना है।
एनसीपीसीआर दिल्ली से कन्सलटेन्ट प्रोफ़ेसनल लॉ एडवोकेट प्रेरणा कौशिक ने बताया कि बाल दुर्व्यवहार के मामलों की रिपोर्टिंग और उनसे निपटने के लिए पुलिस, अभियोजकों, शिक्षकों और अग्रिम पंक्ति के कार्यकर्ताओं की क्षमता निर्माण, बाल संरक्षण कानूनों और स्कूल सुरक्षा ढांचे पर जिला स्तर के हितधारकों के बीच जागरूकता और समझ को बढ़ाना, शैक्षिक परिवेश में बाल सुरक्षा के लिए संस्थागत समन्वय और जवाबदेही को मजबूत किया गया। जेजे अधिनियम और पोक्सो अधिनियम के कार्यान्वयन में सुधार के लिए स्थानीय स्तर की चुनौतियों की पहचान और कार्रवाई योग्य सिफारिशें शिक्षकों, अभिभावकों और बच्चों को सामूहिक रूप से सुरक्षित, समावेशी और अधिकार-आधारित शिक्षण वातावरण को बढ़ावा देने के लिए सशक्त बनाना है।

इस अवसर पर बाल अधिकारिता विभाग सहायक निदेशक डॉ. टीना अरोड़ा ने जिला प्रसाशन की और से अतिथिगण व सन्दर्भ व्यक्तियों व प्रतिभागियों का धन्यवाद ज्ञापित किया व बाल विवाह मुक्त भारत अभियान अंतर्गत बाल विवाह मुक्त भारत की शपथ दिलवाई गई. सामाजिक न्याय व अधिकारिता विभाग से ज्योति प्रकाश अरोड़ा, पुलिस व शिक्षा विभाग महिला बाल विकास श्रम विभाग आदि के जिला अधिकारी समेत संबंधित विभाग के अधिकारी-कर्मचारी तथा सामाजिक संगठनों के पदाधिकारी, अभिभावक व आंगनवाडी कार्यकर्ता मौजूद रहे।
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